Monday, 7 April 2014

प्रेम

माँ, 
बहन ,
बेटी ,
सखी 
और 
 पत्नी के रूप में 
सहज ही मिल जाता रहा है तुम्हें 
'प्रेम ' 
इसलिए तुम्हारा जिद्दी होना तय था 
हे ! महापुरुष  
और क्या कहू !! 

Friday, 4 April 2014

नमक और जिंदगी

नमक के खेतों में पाए गए
कई पैरों से रिसते घाव
गलने तक मुरझाई त्वचा
 तुम
अब भी कहते हो तुम्हारी
जिन्दगी  की थाली में
 नमक बहुत कम है

Monday, 10 March 2014

बसंत से पहले

नि:शब्द
लहराता
कंपकंपाता
थरथराता
फिर गिरा
एक पत्ता
डाली से ....

Sunday, 15 December 2013

मासूम या लाटे [ सूक्ष्म कथा ]

' पगली ! मुझे  'लाटा  ' कहती हो तुम  ..सच तो यह है कि तुम भी 'गूंगी ' थी , अपनी बड़े नेत्रों से समय को जाते हुए देखती रही .....चलो एक बात तो अच्छी है ;  इतने लंबे अंतराल के बाद अभी भी हम दोनों की  याददाश्त ठीक है ;
क्यों !! .... है ना :)

Friday, 28 June 2013

बचपन

 कितने बौने थे !
'आप ' और 'तुम ' के
 संबोधन
उसके 'तू ' कहने भर से ही
गिर पड़े
'बचपन' फिर जीत गया
..





Thursday, 27 June 2013

कब लिखी !!

कब लिखी तुमने
कोई कविता
जब करुणा में द्रवित थे तुम
या थे तुम प्रेम में
या थी मैं विप्रलब्धा
और वियोगी से तुम
न मुझे याद है
ना ही तुम्हें
क्या दोनों प्रेम में थे
मैं तुमसे पूछती हूँ ' प्रेम '


Friday, 3 May 2013

मेरे बोल

मेरे तरल बोल
या
हँसी के मीठे बताशे
कुछ अनकहे संवाद
जो उँगलियों में समा
शब्द बन
तुम तक
न पहुँच सके
एक अबूझ
कविता बन
संचित हैं
 ह्रदय पटल पर